पिछले दो हफ्ते से नेपाल और बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र में भारी बारिश होने के कारण नदियों के जलस्तर में भारी वृद्धि हुई है. उत्तर बिहार के कई जिलों अररिया, किशनगंज, फारबिसगंज, पुर्णिया, सुपौल, मधुबनी, दरभंगा, कटिहार में बाढ़ का पानी घुस गया है.
कोसी, कमला, बागमती, गंडक, महानंदा समेत उत्तर बिहार तमाम छोटी बड़ी नदियों के तटबंधों के किनारे बसे सैकडों गांव जलमग्न हो गए हैं.
मधुबनी के कमला बलान में एक तटबंध के टूटने की भी खबर है. हालांकि प्रशासन का यह दावा है कि तटबंध फिलहाल सुरक्षित है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बिहार में बाढ़ से अभी तक 29 लोगों के मौत हो चुकी है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रविवार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया तथा राहत और बचाव कार्यों को तेज करने के निर्देश दिए हैं .
बाढ़ से उपजे हालात की रिपोर्टिंग के लिए सोमवार की सुबह हम फारबिसगंज पहुंचे. एनएच 27 के किनारे फारबिसगंज के कॉलेज चौक पर एक चाय दुकान में बैठकर कुछ लोग आपस में चर्चा कर रहे थे.
सुबह के आठ बजे भी दिन साफ नहीं हुआ था. आसमान में काली घटाएं छायी थीं. ऊपर से लगातार हो रही बारिश से लोगों के मन में डर बढ़ता जा रहा था.
चाय दुकान चलाने वाले मो. इस्लाम कहते हैं, "इस जगह पर चालीस साल से दुकान है. यह (हाइवे) सबसे ऊंची जगह पर है. पिछली बार (2008 में) जब भीषण बाढ़ आई थी तब भी यहां तक पानी नहीं आया. लेकिन इस बार लगता है छू देगा. हाइवे से सटे उस पार के (जिस तरफ कोसी बहती है) करीब-करीब इलाकों में पानी भर गया है."
शनिवार की रात को जब कोसी बैराज का पानी तीन लाख नवासी क्यूसेक तक पहुंच गया था और बैराज के सभी 56 फाटक खोल दिए गए थे, तब अररिया, फारबिसगंज, सुपौल, मधेपुरा, कटिहार के कई इलाकों में पोरसा भर पानी प्रवेश कर गया था.
अचानक जलस्तर में हुई वृद्धि से इलाके के लोगों के जहन में 2008 में आई प्रलयकारी बाढ़ की यादें ताजा हो आई हैं.
सबसे अधिक डर का अहसास तब हुआ जब बाढ़ प्रभावित इलाकों की रिपोर्टिंग के लिए जिस चारपहिया गाड़ी में हम घूम रहे थे, उसके ड्राइवर ने कहा कि "आपको दिन में जितना घूमना है घूम लीजिए, रात में मुझे घर पर रहना होगा क्योंकि पानी कभी भी आ सकता है. कुछ भी नहीं कहा जा सकता."
कोसी बैराज पर सोमवार को सुबह के दस बजे दो लाख छह हजार क्यूसेक पानी रिकॉर्ड किया गया था. बैराज के पास लगे श्यामपट्ट पर हर घंटे का अपडेट दर्ज होता रहता है. रिकॉर्ड्स के मुताबिक रविवार की शाम से सोमवार की सुबह तक करीब पन्द्रह हजार क्यूसेक पानी बढ़ा था.
शनिवार को अचानक जलस्तर में वृद्धि होने के बाद रविवार को जलस्तर कम होने लगा था. मगर फिर से जलस्तर बढ़ने से चिन्ता बढ़ने लगी थी. जिस वक्त हम कोसी बैराज पर खड़े थे, उस वक्त भी बैराज के 30 फाटक खुले थे. बैराज कंट्रोल पर कोई अधिकारी मौजूद नहीं था, सुरक्षा गार्ड ने बताया कि एसडीओ साहब मुआयना करने साइट पर गए हैं."
कोसी बैराज से खड़े होकर बिहार की ओर देखने पर चारो ओर सिर्फ पानी ही पानी दिख रहा था. धारा इतनी तेज कि डर लग रहा था, कहीं बैराज को ही न बहा ले जाए.
कोसी के पानी को समेटने के लिए दोनो ओर से तटबंध बनाए गए हैं. पूर्वी और पश्चिमी तटबंध. दोनों तटबंधों के किनारे रहने वाली लाखों की आबादी बाढ़ से प्रभावित हैं.
तटबंध के रास्ते से गुजरने के दौरान सड़क के किनारे तम्बू गाड़कर, मचान बनाकर सिर्फ लोग ही लोग दिख रहे थे.
तटबंध के इस पार का इलाका जो नदी की ओर था, पूरा डूबा हुआ था. लोग अपने सामान, अनाज और मवेशियों के साथ सड़क पर शरण लेने को मजबूर थे.
फारबिसगंज से सुपौल आने के क्रम में तटबंध पर बनी सड़क पर कुछ शरणार्थी मिले. सरायगढ़ प्रखंड के ढ़ोली पंचायत के गोरीपट्टी गांव के लोग थे. गांव के करीब 200 घरों में बाढ़ का पानी घुस गया है.
बातचीत में लोगों ने बताया कि शनिवार को जिस दिन जलस्तर अचानक बढ़ गया था, उसी दिन से उनके घरों में पानी घुस गया है.
सड़क पर मूंग की फसल से दाने निकाल रहीं कलावती देवी कहती हैं, "इतनी जल्दी पानी आया कि हमें समय ही नहीं मिला सब कुछ सहजने का. अचानक घर में कमर तक पानी भर गया. बिछौना-ओढ़ना सब भीग गया .अनाज सारा खराब हो गया है. खाना भी बनाने में संकट है, जलावन सारे गीले हो चुके हैं कम से कम दो महीना पानी रहेगा. तब तक जीवन इसी रोड पर कटेगा."
ढोली और उसके आस-पास के इलाकों में हर साल यही स्थिति पैदा होती है. लोगों को अब बाढ़ झेलने की आदत सी हो गई है.
गांव में घुसने पर पता चला कि अभी तक प्रशासन की ओर से कोई नहीं आया है. ना ही किसी तरह की व्यवस्था की गई है. वरना लोग सड़कों पर शरण लिए क्यों दिखाई देते!
गांव के एक युवक धीरज कुमार कहते हैं, "सबको ये लगता है कि तटबंध के किनारे रहने वाले हम जैसे लोगों के लिए बाढ़ झेलना आदत है. मगर ये बात हम लोग ही जानते हैं कि हर साल बाढ़ में हम कितना कुछ खो देते हैं. इस बार तो शुरुआत में ही ये हाल है. अगले तीन महीनों में इसी तरह न जाने कितनी बार पानी बढ़ेगा, कितनी बार कम होगा. अगले कुछ महीनों तक हमारा घर होकर भी घर नहीं रहेगा. हम रोड पर रहेंगे."
रास्ते में आगे बढ़ते हुए कई जगहों पर लोग ऐसे ही सड़कों पर अपने बसेरा लिए दिख रहे थे.
सुपौल के बभनी में ही एक स्कूल दिख गया जहां सैकडों की संख्या में लोगों ने शरण ले रखा था. पुरुष, महिला, बुजुर्ग, बच्चे सभी थे. प्रांगण में अनाज और कपड़े सूखने के लिए रखे थे.
दोपहर के एक बजने को थे. लेकिन किसी को खाना नसीब नहीं हुआ था. बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे. प्रशासन का कोई आदमी वहां मौजूद नहीं दिख रहा था.
पूछने पर लोगों ने बताया कि राहत और बचाव कार्य के नाम पर केवल एक बल्ब लगाया गया है. वो भी तब जब लोगों ने बीती रात को हंगामा किया था.
बाकी कोई इंतजाम उस शरणस्थली पर नहीं दिख रहा था. थोड़ी देर में खाना लेकर एक गाड़ी आयी. चावल और आलू सोयाबीन की सब्जी पीड़ितों के बीच बांटा जाने लगी. जब हमने पूछा तो पता चला कि वो भी प्रशासन द्वारा नहीं बल्कि एनसीसी के कैडेट्स का सामुहिक प्रयास था.
कोसी, कमला, बागमती, गंडक, महानंदा समेत उत्तर बिहार तमाम छोटी बड़ी नदियों के तटबंधों के किनारे बसे सैकडों गांव जलमग्न हो गए हैं.
मधुबनी के कमला बलान में एक तटबंध के टूटने की भी खबर है. हालांकि प्रशासन का यह दावा है कि तटबंध फिलहाल सुरक्षित है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बिहार में बाढ़ से अभी तक 29 लोगों के मौत हो चुकी है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रविवार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया तथा राहत और बचाव कार्यों को तेज करने के निर्देश दिए हैं .
बाढ़ से उपजे हालात की रिपोर्टिंग के लिए सोमवार की सुबह हम फारबिसगंज पहुंचे. एनएच 27 के किनारे फारबिसगंज के कॉलेज चौक पर एक चाय दुकान में बैठकर कुछ लोग आपस में चर्चा कर रहे थे.
सुबह के आठ बजे भी दिन साफ नहीं हुआ था. आसमान में काली घटाएं छायी थीं. ऊपर से लगातार हो रही बारिश से लोगों के मन में डर बढ़ता जा रहा था.
चाय दुकान चलाने वाले मो. इस्लाम कहते हैं, "इस जगह पर चालीस साल से दुकान है. यह (हाइवे) सबसे ऊंची जगह पर है. पिछली बार (2008 में) जब भीषण बाढ़ आई थी तब भी यहां तक पानी नहीं आया. लेकिन इस बार लगता है छू देगा. हाइवे से सटे उस पार के (जिस तरफ कोसी बहती है) करीब-करीब इलाकों में पानी भर गया है."
शनिवार की रात को जब कोसी बैराज का पानी तीन लाख नवासी क्यूसेक तक पहुंच गया था और बैराज के सभी 56 फाटक खोल दिए गए थे, तब अररिया, फारबिसगंज, सुपौल, मधेपुरा, कटिहार के कई इलाकों में पोरसा भर पानी प्रवेश कर गया था.
अचानक जलस्तर में हुई वृद्धि से इलाके के लोगों के जहन में 2008 में आई प्रलयकारी बाढ़ की यादें ताजा हो आई हैं.
सबसे अधिक डर का अहसास तब हुआ जब बाढ़ प्रभावित इलाकों की रिपोर्टिंग के लिए जिस चारपहिया गाड़ी में हम घूम रहे थे, उसके ड्राइवर ने कहा कि "आपको दिन में जितना घूमना है घूम लीजिए, रात में मुझे घर पर रहना होगा क्योंकि पानी कभी भी आ सकता है. कुछ भी नहीं कहा जा सकता."
कोसी बैराज पर सोमवार को सुबह के दस बजे दो लाख छह हजार क्यूसेक पानी रिकॉर्ड किया गया था. बैराज के पास लगे श्यामपट्ट पर हर घंटे का अपडेट दर्ज होता रहता है. रिकॉर्ड्स के मुताबिक रविवार की शाम से सोमवार की सुबह तक करीब पन्द्रह हजार क्यूसेक पानी बढ़ा था.
शनिवार को अचानक जलस्तर में वृद्धि होने के बाद रविवार को जलस्तर कम होने लगा था. मगर फिर से जलस्तर बढ़ने से चिन्ता बढ़ने लगी थी. जिस वक्त हम कोसी बैराज पर खड़े थे, उस वक्त भी बैराज के 30 फाटक खुले थे. बैराज कंट्रोल पर कोई अधिकारी मौजूद नहीं था, सुरक्षा गार्ड ने बताया कि एसडीओ साहब मुआयना करने साइट पर गए हैं."
कोसी बैराज से खड़े होकर बिहार की ओर देखने पर चारो ओर सिर्फ पानी ही पानी दिख रहा था. धारा इतनी तेज कि डर लग रहा था, कहीं बैराज को ही न बहा ले जाए.
कोसी के पानी को समेटने के लिए दोनो ओर से तटबंध बनाए गए हैं. पूर्वी और पश्चिमी तटबंध. दोनों तटबंधों के किनारे रहने वाली लाखों की आबादी बाढ़ से प्रभावित हैं.
तटबंध के रास्ते से गुजरने के दौरान सड़क के किनारे तम्बू गाड़कर, मचान बनाकर सिर्फ लोग ही लोग दिख रहे थे.
तटबंध के इस पार का इलाका जो नदी की ओर था, पूरा डूबा हुआ था. लोग अपने सामान, अनाज और मवेशियों के साथ सड़क पर शरण लेने को मजबूर थे.
फारबिसगंज से सुपौल आने के क्रम में तटबंध पर बनी सड़क पर कुछ शरणार्थी मिले. सरायगढ़ प्रखंड के ढ़ोली पंचायत के गोरीपट्टी गांव के लोग थे. गांव के करीब 200 घरों में बाढ़ का पानी घुस गया है.
बातचीत में लोगों ने बताया कि शनिवार को जिस दिन जलस्तर अचानक बढ़ गया था, उसी दिन से उनके घरों में पानी घुस गया है.
सड़क पर मूंग की फसल से दाने निकाल रहीं कलावती देवी कहती हैं, "इतनी जल्दी पानी आया कि हमें समय ही नहीं मिला सब कुछ सहजने का. अचानक घर में कमर तक पानी भर गया. बिछौना-ओढ़ना सब भीग गया .अनाज सारा खराब हो गया है. खाना भी बनाने में संकट है, जलावन सारे गीले हो चुके हैं कम से कम दो महीना पानी रहेगा. तब तक जीवन इसी रोड पर कटेगा."
ढोली और उसके आस-पास के इलाकों में हर साल यही स्थिति पैदा होती है. लोगों को अब बाढ़ झेलने की आदत सी हो गई है.
गांव में घुसने पर पता चला कि अभी तक प्रशासन की ओर से कोई नहीं आया है. ना ही किसी तरह की व्यवस्था की गई है. वरना लोग सड़कों पर शरण लिए क्यों दिखाई देते!
गांव के एक युवक धीरज कुमार कहते हैं, "सबको ये लगता है कि तटबंध के किनारे रहने वाले हम जैसे लोगों के लिए बाढ़ झेलना आदत है. मगर ये बात हम लोग ही जानते हैं कि हर साल बाढ़ में हम कितना कुछ खो देते हैं. इस बार तो शुरुआत में ही ये हाल है. अगले तीन महीनों में इसी तरह न जाने कितनी बार पानी बढ़ेगा, कितनी बार कम होगा. अगले कुछ महीनों तक हमारा घर होकर भी घर नहीं रहेगा. हम रोड पर रहेंगे."
रास्ते में आगे बढ़ते हुए कई जगहों पर लोग ऐसे ही सड़कों पर अपने बसेरा लिए दिख रहे थे.
सुपौल के बभनी में ही एक स्कूल दिख गया जहां सैकडों की संख्या में लोगों ने शरण ले रखा था. पुरुष, महिला, बुजुर्ग, बच्चे सभी थे. प्रांगण में अनाज और कपड़े सूखने के लिए रखे थे.
दोपहर के एक बजने को थे. लेकिन किसी को खाना नसीब नहीं हुआ था. बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे. प्रशासन का कोई आदमी वहां मौजूद नहीं दिख रहा था.
पूछने पर लोगों ने बताया कि राहत और बचाव कार्य के नाम पर केवल एक बल्ब लगाया गया है. वो भी तब जब लोगों ने बीती रात को हंगामा किया था.
बाकी कोई इंतजाम उस शरणस्थली पर नहीं दिख रहा था. थोड़ी देर में खाना लेकर एक गाड़ी आयी. चावल और आलू सोयाबीन की सब्जी पीड़ितों के बीच बांटा जाने लगी. जब हमने पूछा तो पता चला कि वो भी प्रशासन द्वारा नहीं बल्कि एनसीसी के कैडेट्स का सामुहिक प्रयास था.
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